शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

मिठास

मुझे दु:ख हुआ बौराते ही झर गए आम
ख़ुशी होती यदि आम बनकर

वे चढ़ जाते सबकी जुबान पर
तब मुझे अच्छा भी लगता
माँ आमों का रस निकालकर गुठलियाँ बो देती बाड़े में

माँ कराती इंतजार
पहली बारिश के बाद उनके उगने का
वृक्ष का सपना इन गुठलियों के भरोसे

गुठलियाँ उगते ही
मैं चुपके से उखाड़ कर
बना लेता बाजा

बाजा अपनी मिठास से भर देता माहौल
भर जाती मिठास
प्रथ्वी पर मौजूद तमाम अनुओ में

पोरों से होती हुई कोशिकाओ तक में

यह एक स्मृति जो समय के साथ
सपने में बदल गई .

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गुरुवार, 13 नवंबर 2008

बीज

उठो हवा
धरती से आसमान की ओर बहो
बहो कि तुम्हारी तासीर है यह

कुलबुला रहे हैं बीज
ले चलो
बिखेर दो
इस धरती के कोने-कोने में

विचारों की काटना चाहता हूँ फसल
तुम्हारे अंतस की पीड़ा
चाहता हूँ बांटना

आग बनकर
फैल जाना चाहते हैं बीज.

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