गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

दोस्त

दोस्त तुम्हारा जो यह दोस्ती का ढंग है
यह तुम जो मेरे साथ
मित्रता का बर्ताव करते हो

सचमुच तुम्हारे भीतर यह जो लावा है
धीरे-धीरे मुझे पिघलाता जा रहा है
इसके बाद जो धातु का रेला
तुम्हारी ओर बढ़ता है
इसके पीछे जो निशान है
वे आज तक मेरे ह्रदय पर मौजूद हैं

दोस्त कितना कठिन होता है
जीवन में बिना किसी मित्र के एक
कदम उठाना

ये दोस्ती भी अजब चीज होती है
इसके भीतर जो गीलापन है
उसमे भीगते रहते हैं हम
और वह धीरे-धीरे हमें करता रहता है ख़त्म

कभी हम दोस्ती के नाम से जाने जायें
और जबरदस्त यारी के
जबरदस्त दुश्मनी में भी
दोस्ती ही बनी रहे पहचान हमेशा
तो दोस्त यह भी दोस्ती के हक
में एक बात तो है ही।

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7 टिप्पणियाँ:

यहां 19 दिसंबर 2008 को 9:47 am, Anonymous अनाम ने कहा…

wah!dost kya baat hai.sundar.
rajesh karpenter

 
यहां 20 दिसंबर 2008 को 7:31 am, Blogger sandhyagupta ने कहा…

Sundar abhivyakti. Badhai.

 
यहां 20 दिसंबर 2008 को 10:12 am, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

अन्शु मालवीय कि इसी शीर्षक की कविता की दो पन्क्तिया है
अगर न हो दोस्त
तो नही हुआ जा सकता नास्तिक

बधाई मेरे दोस्तो…तुम्हारे बिना तो मै बस राख हो सकता हूँ ।

 
यहां 21 दिसंबर 2008 को 10:34 am, Blogger Vinay ने कहा…

सुन्दर, अति सुन्दर!

 
यहां 21 दिसंबर 2008 को 9:00 pm, Blogger दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये दोस्ती भी अजब चीज होती है
इसके भीतर जो गीलापन है
उसमे भीगते रहते हैं हम
और वह धीरे-धीरे हमें करता रहता है ख़त्म

दोस्ती सचमुच अजीब होती है
पर दोस्त..........
दोस्तों के लिए खुशनसीब होती है

खूबसूरत लिखा है आपने

 
यहां 29 दिसंबर 2008 को 3:27 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

sabhi sathiyon, rajesh ji, sandhya ji, ashok bhai, vinay ji, nasawa ji aap sabhi ka bahut-bahut dhanywaad.aapane honsala badhaya achchha laga.

 
यहां 17 अगस्त 2009 को 6:15 pm, Blogger श्यामल सुमन ने कहा…

अपनी बात कहने की बेहतर कोशिश।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

 

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