मंगलवार, 11 नवंबर 2008

समय की नोक हमारी गर्दन पर

क्या हो गया है मेरे इस गाँव को
और यहाँ के लोगों को
इनके भीतर बहता था एक झरना लगातार
इनके गीतों में हुआ करता था रसीलापन
छोटी-छोटी खुशियों पर जमता था बड़ा मजमा
येसे कौन-से समय में अटक गया है यह
यह घड़ी की कौन सी सुई के साथ चलने लगा है

यह समय हंसने का नहीं
पसीने में नहाये
पत्थर तोड़ते लोगों में आग को बचाने का
भय से लड़ने
और समूह में रोते लोगों के बीच हिम्मत भरने का है
बैलों की तरह घाने में चलने का नहीं
भैसों की तरह खलिहानों में मुंह मारने का भी नहीं

यह तारों से भरी रात का समय भी नहीं
घुप्प अँधेरी रातों में
चकमक पत्थरों के टकराने का समय है

किसी एक रंग का नहीं
दूसरे का भी नहीं
यह कई रंगों को
रंगों की तरह देखने का समय है

यह एसा तीखा समय है जिसकी नोंक
हमारी गर्दन पर चुभ रही है .

2 टिप्पणियाँ:

यहां 15 नवंबर 2008 को 8:04 am, Blogger vivek gupta ने कहा…

bahadur bhai, bazar tumhari ek acchi kavita hai. lekin uspar koi tippadi nahin aayee hai. keep it up.

 
यहां 25 दिसंबर 2008 को 11:12 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

bahut-bahut dhanyawad vivek bhai.

 

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