मंगलवार, 11 नवंबर 2008

खेतों में हल चला कंठ से गीत निकला.

कितना अच्छा लगता है जब किसी किसान को हल चलाते देखते है
बेलों के गले में घुंघरू की आवाज के साथ
किसान अपनी आवाज मिलाता है
दोनों आवाज जब मिलती है
हल की फाल की नोक पर बेठ जाती है
mitti में samakar उसे upajavu banati है

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4 टिप्पणियाँ:

यहां 11 नवंबर 2008 को 12:48 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

bahut achchha jari rakhana hoga.
kavita.

 
यहां 12 नवंबर 2008 को 6:00 pm, Blogger अनुपम अग्रवाल ने कहा…

आप ज़मीन से जुड़े हुए हैं .
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .

ek sujhaav hai ki apne tipanni column se word verification hata dijiye jisse ye karne mein sabko aasaanee rahe

 
यहां 14 नवंबर 2008 को 10:26 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

anupam ji apane sujhaav diya isake liye dhanyawad. tipanni column se word verification hata liya hai.

 
यहां 11 दिसंबर 2008 को 10:53 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

anupam ji pahali bar mere blog par aane wale pahale vykti hai.bahut hi achchha laga.dhanywad.

 

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