शनिवार, 15 नवंबर 2008

कविता

यह कविता मेरे मित्र विवेक गुप्ता के लिए उस समय हुई थी जब वे देवास से स्थानांतरित होकर इंदौर जा रहे थे। वे जब देवास आये थे तब हम लोगों ने मिलकर साहित्य के लिए बहुत काम किया था। उनके जाने से एक खालीपन आ गया था। वे आजकल इंदौर में है।

विचार

वह गया तब सोचा गया
अद्भुत विचार था

वह एक सोता जो फूटा था
हमारे भीतर

हमारे पास कुछ नहीं था अपना
सिवा खालीपन के
जिसे तरलता से भरा था उसने

वह छोड़ गया है यहाँ पैरों के निशान
जिन्हें कई शताब्दियों की गर्द
मिटाने की कोशिश करेगी

बुला रहे हैं वे निशान उन लोगों को
है नहीं जिनके पास
ठहरा हुआ सच

वह जहाँ से उठा था
वहां ठहरा नहीं है कुछ
चिंगारी दबी है वहां
वह फिर से लौटेगा
आग के साथ
हमारे भीतर बाकी है हवा अभी
उसे देने के लिए धौंकनी।

लेबल: , ,

5 टिप्पणियाँ:

यहां 16 नवंबर 2008 को 9:39 pm, Blogger seema gupta ने कहा…

वह छोड़ गया है यहाँ पैरों के निशान
जिन्हें कई शताब्दियों की गर्द
मिटाने की कोशिश करेगी
VERY TOUCHING AND ADMIRABLE WORDS, THESE WORDS ARE REAL TRUTH OF LIFE..."

regards

 
यहां 21 नवंबर 2008 को 11:42 am, Blogger अनुपम अग्रवाल ने कहा…

अत्यन्त सुंदर .
क्या बढिया चित्रण है

 
यहां 22 नवंबर 2008 को 2:39 am, Blogger Dr.Bhawna ने कहा…

sundar abhivaykti...

 
यहां 23 नवंबर 2008 को 11:15 pm, Blogger art ने कहा…

आपका रचना संसार अलौकि‍क है। शब्‍द रचना उत्‍तम, बधाई सुन्‍दर रचना के लि‍ए।

 
यहां 17 दिसंबर 2008 को 12:52 pm, Blogger neera ने कहा…

वो विचार कितना सुंदर होगा जिस पर यह अति सुंदर कविता लिखी गई है

 

टिप्पणी पोस्ट करें

सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]

<< मुखपृष्ठ