गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

सुबह

ऍन सुबह चाँद बहुत सुन्दर लगा
जाते-जाते
उसने अलविदा कहा
फिर मिलने के वास्ते
कुछ टुकड़े चांदनी के बिखर गए
उसकी रोशनी से सूरज की
लालीमा धुल गई
साफ झक्क सूरज चमक रहा
आसमान में।

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12 टिप्पणियाँ:

यहां 11 दिसंबर 2008 को 10:54 pm, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

्क्या चित्र है … वाह

 
यहां 12 दिसंबर 2008 को 1:19 pm, Blogger Alpana Verma ने कहा…

कुछ टुकड़े चांदनी के बिखर गए
उसकी रोशनी से सूरज की
लालीमा धुल गई

bahut sundar rachna

 
यहां 14 दिसंबर 2008 को 11:20 am, Blogger manu ने कहा…

bahut achhaa kahaa janaab

 
यहां 15 दिसंबर 2008 को 2:30 am, Blogger Dr.Bhawna ने कहा…

सुन्दर रचना ...

 
यहां 15 दिसंबर 2008 को 6:04 am, Blogger रजनीश 'साहिल ने कहा…

Ummeed ki gahri kiran...adbhut aabhas.

 
यहां 15 दिसंबर 2008 को 11:08 am, Blogger पूनम श्रीवास्तव ने कहा…

Respected Patel ji,
apko mere kaviton ke tareef ke liye dhanyavad.Apkee kavtaen maine padhee .Apkee kavitayen prakriti ke kafee najdeek hain...inmen prakriti ke anukool hee komal shbdon ka chayan bhee kiya gaya hai.Badhai.

 
यहां 15 दिसंबर 2008 को 10:30 pm, Blogger रश्मि प्रभा... ने कहा…

ek saundarypurn pralritik rachna-bahut achhi

 
यहां 15 दिसंबर 2008 को 11:37 pm, Blogger BrijmohanShrivastava ने कहा…

संधिकाल का सजीव चित्रण /पटेल जी यही जिंदगी है / चाँद वादा करके चला जाता है ,आने का फिर मिलने का और अपनी यादों की चांदनी छोड़ जाता है और उन यादों की चांदनी में हमारे अरमान ,अपेक्षाएं ,धुलते रहते हैं

 
यहां 16 दिसंबर 2008 को 3:53 am, Blogger Unknown ने कहा…

sunder shabdon ka sangam!

 
यहां 16 दिसंबर 2008 को 3:58 am, Blogger रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

aapakee abhivyakti achchhee hai , badhaayee svikaaren !

 
यहां 16 दिसंबर 2008 को 4:00 am, Blogger mala ने कहा…

sundar rachanaa

 
यहां 16 दिसंबर 2008 को 4:02 am, Blogger गीतेश ने कहा…

aapake blog par pahali bar aaya, achchhaa lagaa, aise hee likhate rahen !

 

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