शुक्रवार, 27 मार्च 2009

मैं यहाँ से जा रहा हूँ

मैं यहाँ से जा रहा हूँ
बिना कुछ लिए
अपने पूरे वजूद के साथ जाना चाहता हूँ
लेकिन बहुत कुछ छूट जाता है यहाँ
और मैं जाते हुए भी
नहीं जा पा रहा हूँ पूरी तरह से

मेरे साथ नहीं जाएँगी वे
बहुत सी चीजें
जो जुड़ी रही मुझसे
ताउम्र आती रही मेरे काम
घिसती रही मेरे साथ-साथ
कुछ इच्छा से
कुछ अनिच्छा से

मेरा जाना स्थगित नहीं है
लौटना जरूर संदेहास्पद है
मेरा सबकुछ मुझसे रहा यहीं
पड़ा रह जाएगा
कुछ दूसरों के काम आएगा
कुछ टूट जाएगा
पड़ा रहेगा कबाड़ में
कुछ जला दिया जाएगा
और धुएं में फैल जाएगा

साँस लेकर छोड़ी गई हवा
पेड़ों में जीवित रहेगी
इस तरह बचा रहेगा मेरा होना
यहाँ इस पृथ्वी पर ।

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8 टिप्पणियाँ:

यहां 27 मार्च 2009 को 12:38 pm, Blogger राज भाटिय़ा ने कहा…

बहादुर भाई, टाईटल पढ कर तो थोडा बिचलित हुया कि भाई कही ब्लांग जगत से जाने की बात तो नही कह रहे,
शुकर एक सुंदर कविता निकली...
साँस लेकर छोड़ी गई हवा
पेड़ों में जीवित रहेगी
इस तरह बचा रहेगा मेरा होना
यहाँ इस पृथ्वी पर ।
बहुत ही अच्छी लगी आप की यह कविता.
धन्यवाद

 
यहां 27 मार्च 2009 को 6:12 pm, Blogger Sushil Kumar ने कहा…

अच्छी भावाव्यक्ति।इस कविता से मुझे अशोक वाजपेयी की एक कविता याद आ गयी जिसमें वे कहते हैं कि मैं कहीं भी चला जाऊंगा पर थोड़ा सा यहीं बचा रह जाऊंगा।
मित्र, अगर मौका मिले तो इस लिंक को कापी-पेस्ट कर खोल कर पढे़ और अपनी राय दें-
https://www.blogger.com/comment.g?blogID=1514641830032186256&postID=393523654395073610

 
यहां 28 मार्च 2009 को 4:42 am, Blogger प्रदीप कांत ने कहा…

साँस लेकर छोड़ी गई हवा
पेड़ों में जीवित रहेगी
इस तरह बचा रहेगा मेरा होना
यहाँ इस पृथ्वी पर ।

...............

 
यहां 29 मार्च 2009 को 11:19 pm, Blogger रजनीश 'साहिल ने कहा…

Achchhi kavita.
Par aisa laga ki kuchh adhura hai, laga ki ye pahla hi draft aapne post kiya hai.
Ho sakta hai ye mera khayal ho, par jitna aapko jana hai uske mutabik is kavita ke aur behtar hone ki ummeed karta hoon.

 
यहां 3 अप्रैल 2009 को 12:39 am, Blogger sandhyagupta ने कहा…

Manav jeevan nashwar hai lekin usse judi chijen,uske vichar,srijan prithvi par bache rahte hain,usse jude rahte hain .Ek achchi rachna ke liye badhai.

 
यहां 4 अप्रैल 2009 को 5:14 am, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

bhai

antim panktiyon ki vyanjana adbhut hai.

 
यहां 14 अप्रैल 2009 को 12:36 am, Blogger रवीन्द्र दास ने कहा…

bana rahne ki itni utkat abhilasha!

 
यहां 20 मई 2009 को 9:07 am, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

अरे भाई कहां चले गये?

ऐसे जाने के लिये किसने कहा था?

 

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