सोमवार, 12 जनवरी 2009

शब्द

हमारे पास शब्दों की कमी

बहुत यही वजह है कि

बचा नहीं सकते कुछ भी एसा

कि जैसे चिड़िया की चहचहाहट

सब कुछ होते हुए भी शब्दों का न होना

कुछ नहीं होने जैसा है

दीवार है हमारे पास

जिसे खड़ा करते हम अपने चारों और

जीवन के भीतर एसा कोई उजास नहीं

जिसके बल पर खड़ी की जा सकती हो कोई इमारत

न कोई एसा ठिकाना कि आसपास महसूस हो जीवन

एसी कोई आवाज भी नहीं

जिसकी धमक से खिंचा चला आए कोई

और सुने हमें धरती पर जीवन रहने तक

शब्दों के बिना हम कैसे सुना सकते हैं जीवनराग

कैसे बताएं कि तितली का

रंग और सुगंध से बहुत गाढा रिश्ता है

जैसे शब्द का भाषा और संस्कृति से

बिना शब्दों के मनुष्यता से तो बाहर होते ही हैं

भाषा की दुनिया में भी नहीं हो सकते दाखिल ।

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15 टिप्पणियाँ:

यहां 12 जनवरी 2009 को 8:19 pm, Blogger Krishna Patel ने कहा…

हमारे पास शब्दों की कमी
बहुत यही वजह है कि
बचा नहीं सकते कुछ भी एसा
कि जैसे चिड़िया की चहचहाहट
bahut achchhi kavita hai papa asehi
likte rhiye

 
यहां 13 जनवरी 2009 को 7:43 am, Blogger Unknown ने कहा…

bahut acchi kavita .........

 
यहां 14 जनवरी 2009 को 2:46 am, Blogger Amit Kumar Yadav ने कहा…

आपकी रचनाधर्मिता का कायल हूँ. कभी हमारे सामूहिक प्रयास 'युवा' को भी देखें और अपनी प्रतिक्रिया देकर हमें प्रोत्साहित करें !!

 
यहां 16 जनवरी 2009 को 7:30 am, Blogger sandhyagupta ने कहा…

Shabd sadhakon ke liye ek sandesh hai yah kavita.

 
यहां 18 जनवरी 2009 को 2:17 am, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

कई दिनों बाद लॉटा और यह कविता देखी।
सच तो है शब्द ना हो तो शायद कुछ भी नही होगा इतना सुन्दर और साजिश हो रही जब इसके खिलाफ़ तो कवि को दर्ज़ कराना ही होगा अपना प्रतिरोध।

 
यहां 19 जनवरी 2009 को 3:52 am, Blogger प्रदीप कांत ने कहा…

कैसे बताएं कि तितली का
रंग और सुगंध से बहुत गाढा रिश्ता है
जैसे शब्द का भाषा और संस्कृति से
बिना शब्दों के मनुष्यता से तो बाहर होते ही हैं
भाषा की दुनिया में भी नहीं हो सकते दाखिल ।

Behtar chintan

 
यहां 19 जनवरी 2009 को 11:20 am, Anonymous अनाम ने कहा…

bahadur bhai
aapne bahut achchhi kavita post ki hai.
achchhe bimbon aur pratikon ka istemal kiya aapne.
bahut badhai aapko.

 
यहां 19 जनवरी 2009 को 11:22 am, Anonymous अनाम ने कहा…

mera khata nahin hai.
upar tippani me naam dena bhul gaya tha.

-rajesh karpenter.

 
यहां 30 जनवरी 2009 को 11:19 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

amitji, yuvaji, sandhyaji, ashokji, pradeepji, rajeshji
aap sabhi ka bahut-bahut dhanywaad.

 
यहां 30 जनवरी 2009 को 10:08 pm, Blogger ravindra vyas ने कहा…

sahi ja rahe ho pyare! lage raho!!

 
यहां 31 जनवरी 2009 को 12:57 am, Blogger varsha ने कहा…

nishabd karti ek kavita...

 
यहां 1 फ़रवरी 2009 को 10:03 am, Blogger Bahadur Patel ने कहा…

ravindra bhai aur varsha ji aapako bahut-bahut dhanywaad.

 
यहां 5 फ़रवरी 2009 को 7:19 am, Blogger saloni ने कहा…

iss kavita me kuch panktiya achchhi hone ka prashn hi nahi uthta.puri kavita hi sundar bhasha se susajjit hai.vastav me shabdon ke bina jivan vyarth hai.papa aapki rachna adbhut hai.i really love your poems.
best wishes.

 
यहां 6 फ़रवरी 2009 को 6:13 am, Blogger निर्मला कपिला ने कहा…

bahut khoob bhavavyakti hai

 
यहां 3 मार्च 2009 को 10:13 pm, Blogger रजनीश 'साहिल ने कहा…

बहुत सुंदर कविता। बधाई।
मेरे मन में अक्सर आता रहा विचार
आपके शब्दों में रु-ब-रु पाया। शुक्रिया।

 

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