रविवार, 4 अक्तूबर 2009

नदी


मेरे भीतर एक नदी बहती हुई
उसके शीतल जल से

हहराता हुआ एक पेड़ घना
हवा के झोंकों से हिलता

वहीं किनारे पर
मिट्टी गाँव की
बस चुकी है फेफडों में मेरे


एक कुम्हार बनाता है घड़ा
नदी से भरता घड़ा
बिल्कुल ठंडा और सुगंध से भरा पानी
जिसे पीते ही गलने लगती है प्यास
उदास चहरे
पपद्दाते होठों पर
सुकून की छाया तैरने लगती है

नदी मेरे भीतर पैदा करती है एक संसार ।

लेबल: , ,

9 टिप्पणियाँ:

यहां 4 अक्तूबर 2009 को 12:42 pm, Blogger Ashok Kumar pandey ने कहा…

बहादुर भाई यह कविता विशिष्ट ना होते हुए भी बेहद खूबसूरत है.
इस नदी को सूखने मत देना...

 
यहां 4 अक्तूबर 2009 को 6:44 pm, Blogger अनुपम अग्रवाल ने कहा…

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

 
यहां 4 अक्तूबर 2009 को 11:47 pm, Blogger शरद कोकास ने कहा…

बढ़िया कविता है । अंतिम छह पंक्तियो में थोड़ा शिल्पगत काम करना होगा कुछ इस तरह ..
एक कुम्हार बनाता है घड़ा
नदी से भरता है
ठंडा और सुगंध से भरा पानी
पीते ही गलने लगती है प्यास
उदास चहरे
पपड़ाये होठों पर
तैरने लगती है
सुकून की छाया

 
यहां 5 अक्तूबर 2009 को 12:26 am, Blogger varsha ने कहा…

पीते ही गलने लगती है प्यास ...nice.

 
यहां 5 अक्तूबर 2009 को 10:08 pm, Blogger sandhyagupta ने कहा…

Prakriti me zeevan dhundne ki ek sundar koshish.

 
यहां 11 अक्तूबर 2009 को 11:17 am, Anonymous अनाम ने कहा…

bahut achchhi kavita hai.
badhai.
kalidas

 
यहां 18 अक्तूबर 2009 को 1:32 pm, Blogger गिरीश बिल्लोरे मुकुल ने कहा…

Swagat hai patel sahab
anand a gaya

 
यहां 23 अक्तूबर 2009 को 6:15 am, Blogger प्रदीप जिलवाने ने कहा…

छोटी पर उम्‍दा रचना है. बधाई.

 
यहां 10 नवंबर 2009 को 1:33 am, Blogger प्रदीप कांत ने कहा…

नदी मेरे भीतर पैदा करती है एक संसार ।

Kabhi kabhi ek pankti me hi nadi kavita ho jati hai

 

टिप्पणी पोस्ट करें

सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]

<< मुखपृष्ठ