रविवार, 22 अगस्त 2010

सुनाऊंगा कविता

शहर के आखिरी कोने से निकालूँगा
और लौट जाऊंगा गाँव की ओर
बचाऊंगा वहां की सबसे सस्ती
और मटमैली चीजों को
मिट्टी की ख़ामोशी से चुनूंगा कुछ शब्द

बीजों के फूटे हुए अँखुओं से
अपनी आँखों के लिए
लूँगा कुछ रोशनी

पत्थरों की ठोकर खाकर
चलना सीखूंगा
और उन्हें दूंगा धन्यवाद
उनके मस्तक पर
लगाऊंगा खून का टीका

किसान जा रहे होंगे
आत्महत्या के रास्ते पर
तब उन्हें रोकूंगा
सुनाऊंगा अपनी सबसे अंतिम
और ताजा कविता
वे लामबंद हो चल पड़ेंगे
अपने जीवन की सबसे दुरूह पगडंडी पर ।

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गुरुवार, 13 नवंबर 2008

बीज

उठो हवा
धरती से आसमान की ओर बहो
बहो कि तुम्हारी तासीर है यह

कुलबुला रहे हैं बीज
ले चलो
बिखेर दो
इस धरती के कोने-कोने में

विचारों की काटना चाहता हूँ फसल
तुम्हारे अंतस की पीड़ा
चाहता हूँ बांटना

आग बनकर
फैल जाना चाहते हैं बीज.

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