गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

पिता की मृत्यु पर बेटी का रुदन

( जब भी कोई मरता है, सबसे पहले दिए गए दु:ख फैलते हैं आसपास )

आप पेड़ थे और छाँव नहीं थी मेरे जीवन में

पत्ते की तरह गिरी आपकी देह से पीलापन लिए

देखो झांककर मेरी आत्मा का रंग हो गया है गहरा नीला

कभी पलटकर देखा नहीं आपने

नहीं किया याद

आप मुझसे लड़ते रहे समाज से लड़ने के बजाय

मैं धरती के किनारे पर खड़ी क्या कहती आपसे

धकेल दी गई मैं, ऐसी जगह गिरी

जहाँ माँ की कोख जितनी जगह भी नहीं मिली

आप थे इस दुनिया में

तब भी मेरे लिए नहीं थी धरती

और माँ से धरती होने का हक छीन लिया गया है कबसे

छटपटा रही थी हवा में

देह की खोह में सन्नाटा रौंद रहा था मुझे

और अपनी मिटटी किसे कहूं , किसे देश

कोई नहीं आया था मुझे थामने

जीवन इतना जटिल

कितने छिलके निकालेंगे दु:खों के

उसके बाद सुख का क्या भरोसा

कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे

हमारी सिसकियों से हमारे ही कान के परदे फट जाएँ

ह्रदय का पारा कब नाभी में उतर आये

मोह दुश्मन है सबका

मौत आपकी नहीं मेरी हुई है

हुई है तमाम स्त्रियों की

यह आपकी बेटी विलाप कर रही है निर्जीव देह पर

चीत्कार पहुँच रही है ब्रह्मांड में

जहाँ पहले से मौजूद है कई बेटियों का हाहाकार

और कोई सुन नहीं पा रहा है .

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गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

दोस्त

दोस्त तुम्हारा जो यह दोस्ती का ढंग है
यह तुम जो मेरे साथ
मित्रता का बर्ताव करते हो

सचमुच तुम्हारे भीतर यह जो लावा है
धीरे-धीरे मुझे पिघलाता जा रहा है
इसके बाद जो धातु का रेला
तुम्हारी ओर बढ़ता है
इसके पीछे जो निशान है
वे आज तक मेरे ह्रदय पर मौजूद हैं

दोस्त कितना कठिन होता है
जीवन में बिना किसी मित्र के एक
कदम उठाना

ये दोस्ती भी अजब चीज होती है
इसके भीतर जो गीलापन है
उसमे भीगते रहते हैं हम
और वह धीरे-धीरे हमें करता रहता है ख़त्म

कभी हम दोस्ती के नाम से जाने जायें
और जबरदस्त यारी के
जबरदस्त दुश्मनी में भी
दोस्ती ही बनी रहे पहचान हमेशा
तो दोस्त यह भी दोस्ती के हक
में एक बात तो है ही।

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गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

सुबह

ऍन सुबह चाँद बहुत सुन्दर लगा
जाते-जाते
उसने अलविदा कहा
फिर मिलने के वास्ते
कुछ टुकड़े चांदनी के बिखर गए
उसकी रोशनी से सूरज की
लालीमा धुल गई
साफ झक्क सूरज चमक रहा
आसमान में।

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